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सर्वभाषामयी भाषा सिरिभूवलय ग्रंथ का उदय तथा विकास

आंग्लमे परिवर्तित कन्नड अंकों के एक चक्र के दृष्टांत जिससे ७१८ भाषावों के साहित्य निकाला जासक्ता है ।
२२ वें तीर्थंकर नेमीजी से यह देववाणी द्वारका नगर के श्रीकृष्णजी को उपदेश के रूप में प्राप्त हुई । तदनंतर व्यास महर्षिजी को यह देववाणी उनकी रचना जयाख्यान में संग्रहित हुई । यही देववाणी 'भगवद्गीता' के एक सौ तिरसठ श्लोकों के रूप संकलित हुए । युद्ध से बिमुख हुए अर्जुनदेव को श्रीकृष्णजी ने 'भगवद्गीता' का उपदेश दिया ।

तेईस्वे तीर्थंकर पार्श्वनाथजी के शिष्य गौतम, बुद्ध बनकर बौद्धमत की स्थापना की । चौबीसवें तीर्थंकर महावीरजी से उनके गणधर गौतमजी को यह देववाणी उपदेश के रूप में  प्राप्त हुई । गौतम गणधरजी ने इस भगवद्वाणी को 'पूर्वेकाव्य' के नाम से ग्रंथस्त कर लिया । इस ग्रंथ के अन्य नाम हैं - 'मंगलपाहूड' तथा करणसूत्र । गौतमजी ने इस देववाणी को श्रेणिक नाम के राजा को उपदेश दिया । दस गुरु परम्परा के पश्चात प्रभावसेनजी नामक गुरू ने कन्नड, संस्कृत और प्राकृत प्रधान 'मंगलपाहुड' को निरूपण किया । इसी गुरू परम्परा में आगे चलकर ई.सन ४०० में भूतबलीजी इस देववाणी को 'भूवलय' के नाम से निरूपण किया । यही गुरू परम्परा आगे चलकर पंचदवलो के रूप की देववाणी को वीरसेनाचार्यजी ने व्याख्यान की रचना की । इ.सन ८२० इनका शिष्य जिनसेनजी ने लगभग इसी समय में 'महापुराण' का संकलन किया । चौबीसवें तीर्थंकर महावीरजी के निर्वाण होनॆ के पश्चात एक हजार डेढ़ वर्ष में कुमुदेन्दु मुनीजी ने ई.सन ८०० कॆ लग्भग में 'नूतन-प्राक्तन' नामक दो क्रमों में जो 'भगवद्वाणी' थी, उसे कन्नड अंकों में, और नवमांक क्रम में, सर्वभाषामयी कन्नड भाषा में रचा गया । हां! उन्होंनॆ 'सर्वभाषामयी-भाषा सिरिभूवलय' कॆ नाम से कन्नड अंक काव्य के रूप में ताल पत्रों में लिखा है ।

भरतखंड (भारत) का एक प्राचीन सम्राट का नाम था ऋषभदेव (आदी तीर्थंकर) । उनकॆ दो पत्निया‍ थी - यशस्वतीदेवी और सुनन्दादेवी । उनकी संतानें थी - भरत, बाहुबली, ब्राह्मीदेवी और सौन्दरीदेवी । बाहुबली के अन्य नाम थे अजित और गॊम्मट ।

आदितीर्थंकर ऋषभदेवजी को केवलज्ञान (मोक्षज्ञान) प्राप्त था । उसका (केवलज्ञान का) सारही सिरिभूवलय ग्रंथ का मूलाधार है । ऋषभदेवजी ने अपनी पुत्रियों को समझाया कि कन्नड अंक ही अक्षर है और कन्नड अक्षर ही अंक है एवं उन्होंनॆ इनके स्वरूप को भी समझाया ।

ऋषभदेवजी के मुख से निकली हुई देववाणी को आदिमन्मथ स्वरूपी गोम्मटदेव ने अंकबंध के रूप में स्वीकार किया तथा यह देववाणी बडे भाई भरतजी को उनसे प्राप्त हुई । यह दिव्यवाणी आगे तीर्थंकर संभवजी को प्राप्त हुई । इसी क्रम में एक के बाद एक को यानी अभिनंदन सुमति; पद्मप्रभा; सुपार्श्व; चन्द्रप्रभा, पुष्पदन्त, शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य; विमल; अनंत; धर्म; शांती; कुन्थू; अर; मल्ली, मुनिसुब्रत, नमी, नेमी आदि २१ तीर्थंकरों तक यह देववाणी की धारा उपदेश के रूप मे प्रवाहित हुई । जैन सम्प्रदाय के प्राचीन ग्रंथों से पता चलता है कि इन तीर्थंकरों की कालावधी में कभी-कभी तीन हजार वर्षों का अंतर था । अति प्राचीन तीर्थंकरों की जीवनावधी लाखों वर्षों का अंतर था ।

कुमुदेन्दु मुनीजी नें 'सर्वभाषामयी भाषा सिरिभूवलय' ग्रंथ को गंगरस यानी गंगवंश के राजा शिवमारजी (सन ७८८-८१२), और राष्ट्रकूट चक्रवर्ती (सम्राट) अमोघवर्ष नृपतुंग (ई.सन ८१४-८८०) को उपदेश किया । भविष्य में सेनगण के सेनाधिपति सेनजी की धर्मपत्नी मल्लिकब्बेजी ने 'सिरिभूवलय' ग्रंथ का कोरे कागज में नकल करवाया । उन्होंनॆ अपने गुरू माधनंदीजी (माघणनंदी) को शास्त्रदान किया । इस ग्रंथ की प्रति लिपियों में एक प्रति लिपि बॆंगळूर-तुमकूर रेल मार्ग पर स्थित दॊड्डबेलॆ नामक ग्राम (कर्नाटक प्रांत) के निवासी सुप्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सक धरणेन्द्र पंडितजी के घर में रही थी । वे अपने मित्र चन्दापंडितजी के साथ अंकलिपि में रचित 'सिरिभूवलय' सुनाकर व्याख्यान देते थॆ । यह एक ऐतिहासिक (विषय) प्रसंग है । सन १९१३ में धरणेंद्र पंडितजी का देहांत हुआ । आगे चलकर बॆंगळूर के औषधालय के मालिक ऎल्लप्प शास्त्रीजी ने इस प्राचीन अंक-काव्य खरीद लिया और अपने ग्रंथालय में संग्रह किया ।

सर्वभाषामयी, सर्वशास्त्रमयी, एवं सर्वज्ञानमयी के नामों से विख्यात सिरिभूवलय में रसविध्या है । इस ग्रंथ का अध्ययन कर 'सुवर्ण (सोनॆ)' की सृष्टि करने का स्वन्प ऎल्लप्पशास्त्रीजी ने देखा था । सन १९२७ के स्वातंत्र्य आन्दोलन के संदर्भ में कर्लमंगलम श्रीकंठय्याजी बॆंगळूर में आकर बस गए । वे बहुभाषा विद्वान थे । उन्होंने इस ग्रन्थ का रहस्य खोजनॆ का निश्चय किया । उनके अथक परिश्रम से सिरिभूवलय अंकों के शृंखला से मुक्त हो गया । उन्होनॆ कन्नड के सांगत्य नामक छन्दों में तथा कन्नड अक्षर लिपि में सिरिभूवलय की रचना की ।

सन २९५३ ई. में बॆंगळूर कॆ कन्नड साहित्य परिषद ने सिरिभूवलय को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया । इस ग्रंथ के उत्तराधिकारी (वारिसदार) ऎल्लप्पशास्त्रीजी, ग्रंथ-संशोधक कर्लमंगलम श्रीकंठय्याजी, इनके सगे मित्र कन्नड के परम सेवक अनंतसुब्बरावजी ने जीवन पर्यंत ग्रन्थ के प्रचारक बनकर सेवा की । अनंतसुब्बराव जी से सुप्रेरणा प्राप्त कर निश्चय इतिहास के आधार पर सिरिभूवलय सार रूप को सुधार्थीजी ने पाठकों कॆ करकमलों में समर्पित किया है । 'सर्वभाषामयी भाषा सिरिभूवलय सार' नामक कन्नड ग्रन्थ में प्राचीन अंक काव्य का उदय, विकास, तथा इतिहास पर सुधार्थिजी ने एक विहंगम दृष्टी डाली है ।

मूल कन्नड परिचयकार : सुधाथी हासन
भावानुवाद : ऎस. रामण्ण
अंतर्जाल्मे प्रचारक : हेमन्त कुमार जि

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