Monday, 11 January 2016

Chanakya Dialogues (Episode 36)

महामंत्री वररुचि के चेतावनी की प्रति आचार्य विष्णुगुप्त की प्रत्युत्तर

प्रणाम महामंत्री । आपने मुजॆ यहा बुलायाहे महामंत्री ?

आचार्य विष्णुगुप्त, मे आचार्यों का सम्मान करता हू । और तक्षशिला कॆ आचार्यों का विशेष गर्व, इसलियॆ मॆने सम्मान पूर्वक आपको यहा बुलवाया । अन्यता मेरी सूचना आपको मेरे सेवक भी देसकते ते ।

यदि ये सम्मान योग्यता के कारण है तो मे इसे स्वीकार करता हू ।
अन्यता इसे अस्वीकार करता हू ।

आचार्य विष्णुगुप्त! मे आपको सावधान कररहा हू । यदि आपके आचरण के कारण मगध का अहित हुआ, तो आपके सात भी कठोरता पूर्वक व्यवहार किया जायेगा ।

इसका निर्णय कौन करेगा महामंत्री कि मेरा आचरण मगध का अहित कर रहा है?

विष्णुगुप्त!!

यदि आपके मगध के प्रति निष्ठा आपको बाध्य करती है, कि आप मगध के संकुचित राजनीती का अहित करनेवालों से कठोर व्यवहार करे, तो मेरी इस धारा के प्रति निष्ठा मुजे बाध्य करती है, कि जो जो इस धारा के हित मे बाधक हो; कंटक हो; उनके सात मे कठोरता पूर्वक व्यवहार करू । और अवश्यक्ता पडने पर उनके विनाश भी!

आचार्य विष्णुगुप्त आप अपनी जननी के सात द्रोह कर रहे है ।


पाटलीपुत्र मेरी मातृ भूमि नही है । और ना ही एवं तक्षशिला । ना ही एवं मगध । ना ही एवं गांधार । 

हिमालय से लेकॆ समुद्र पर्यंत भूमि का कण कण मेरा है । और उसॆ गौरवशाली मातृभूमी कहने का मुजे अधिकार है । और मुजसे मेरा वो अधिकार कोही नही चीन सकता । 

एक राष्ट्र जीवन मे व्यक्ती मा के गर्भ के सात सात एक संस्कृती के गर्भ से भी जन्म लेता है । और जिस संस्कृती के गर्भ से मेने जन्म लिया है, उसका नाम है "भारतीय" । जिस धरा पर मेने जन्म लिया है, उसका नाम है - "भारतवर्ष" । 

दुःख है मुजे कि मुजे आपको और राजनिष्ठा के अनुपों को स्मरण कराना पड रहा है, कि नंद वंश मगध नही है और मगध नंद वंश नही है । दुःख है मुजॆ कि आप जैसे विद्वान पुरुष भी जब जब आवांचनीय राजकुलों पर संकट आए अतः तब तब उसे राज्य संकट अथवा राष्ट्र संकट के संज्ञा देते है । 

महामंत्री, मे फिर एक भार आपको स्मरण कराता हू कि नंद वंश मगध नही है । मगध इस राष्ट्र का एक अभिन्न अंग है । और यदि विष्णुगुप्त चाणक्य राष्ट्रद्रोह करे, तो वो मृत्युदंड का भागी होगा । और यदी आप जर्जय हो रहे नंद वंश का पतन नही देख पारहे है तो, उसे मगध का अहित के संज्ञा ना दीजिए महामंत्री । और यदि फिर भी आपको लगता है कि, मे अपनी जननी के सात द्रोह कर रहा हू, तो एक दिन आपको अपना व्याकरण ही बदलना होगा । 

और जाते जाते विष्णुगुप्त चाणक्य इतना कह जाता है कि, जो जो इस राष्ट्र की एकता और उत्कर्ष की मार्ग मे बाधक हुआ, वह नष्ट होगा । उसका विनाश करूंगा मे! और जब तक मे पुनः इस राष्ट्र को गौरवशाली नही देखलेता, तब तक संबालो स्वयं को महामंत्री । 

प्रलय का आगमन हो रहा है ! और इस बार स्वर्ग के देवता भी इसके मार्ग नही रोकपाएंगे !!

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